«चलता है» — दो शब्द जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रहे हैं

«चलता है।» भारत में शायद ही कोई वाक्य इतना काम आता हो। देर हो गई? चलता है। काम आधा-अधूरा? चलता है। खाना, सेहत, हिसाब, वादा — चलता है। यह सुनने में उदारता लगती है, लचीलापन लगता है, बड़ा दिल लगता है। और कभी-कभी होता भी है।

लेकिन ज़्यादातर बार यह कुछ और है: मानक गिराने की एक इतनी पुरानी आदत कि अब वह दिखती ही नहीं।

«चलता है» असल में क्या करता है

हर «चलता है» एक छोटी बातचीत है जो तुम ख़ुद से करते हो — और हर बार हारते हो। «आज व्यायाम नहीं, चलता है।» «यह महीना बचत नहीं, चलता है।» «इस काम में यह ग़लती रह गई, चलता है।» अकेले में हर एक छोटा है। लेकिन हक़ीक़त उन्हें अकेले नहीं गिनती। वह उन्हें जोड़ती है। और बीस साल के «चलता है» का जोड़ एक ऐसी ज़िंदगी है जो बस… चल रही है। न गिरती, न उठती। चलती है।

यहाँ वह बात है जो मुझे सबसे महँगी पड़ी: हक़ीक़त तुम्हें वह नहीं देती जो तुम चाहते हो। वह तुम्हें वह देती है जो तुम चलने देते हो। तुम्हारा मानक ही तुम्हारी छत है — प्रतिभा नहीं, क़िस्मत नहीं, हालात नहीं। जहाँ तुमने «चलता है» कहा, वहीं तुम्हारी ज़िंदगी की सीमा खिंच गई।

यह इतना आसान क्यों है

क्योंकि «चलता है» का कोई तुरंत बिल नहीं आता। आज व्यायाम छोड़ने से आज कुछ नहीं होता। इस महीने बचत न करने से इस महीने कुछ नहीं बिगड़ता। काम में एक छोटी ग़लती से आज कोई ग्राहक नहीं जाता। बिल बाद में आता है — पाँच साल बाद, दस साल बाद — और तब वह इतना बड़ा होता है कि उसे «चलता है» से जोड़ना मुश्किल लगता है। लेकिन वह वहीं से आया है।

फ़र्क़ जो समझना ज़रूरी है

मैं यह नहीं कह रहा कि हर चीज़ पर सख़्त हो जाओ। हर चीज़ पर सख़्ती एक जेल है, और वह भी टिकती नहीं। फ़र्क़ यह है: किन चीज़ों पर «चलता है» सचमुच चलता है, और किन पर नहीं। मेहमान देर से आया — चलता है। बारिश में योजना बदली — चलता है। लेकिन अपनी सेहत, अपने पैसे, अपने दिए हुए वचन, अपने काम की गुणवत्ता — इन चार जगहों पर «चलता है» नहीं चलता। इन चार पर तुम जो मानक रखते हो, वही तुम्हारी ज़िंदगी का मानक है। बाक़ी सब विवरण है।

शब्द बदलो

मैंने इन चार जगहों पर «चलता है» की जगह एक छोटा सा सवाल रख दिया: «क्या मैं इसे अपने नाम के साथ जाने दूँगा?» यह काम, यह हिसाब, यह वादा, यह शरीर — अगर इस पर मेरा नाम लिखा हो, तो क्या यह ठीक है? अगर हाँ, तो ठीक है। अगर नहीं, तो यह चलता नहीं है — चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो।

«चलता है» कहना आसान है। लेकिन याद रखो: जो तुम चलने देते हो, वही चलता रहता है। और आख़िर में तुम्हारी ज़िंदगी भी बस चलती रहती है — उस दिशा में जो तुमने कभी चुनी ही नहीं।

काम

  1. एक दिन गिनो कि तुम कितनी बार «चलता है» कहते या सोचते हो। सिर्फ़ गिनो।
  2. वे चार जगहें लिखो जहाँ तुम्हारे लिए «चलता है» नहीं चलेगा: सेहत, पैसा, वचन, काम — या अपनी चार।
  3. तीस दिन तक इन चार पर हर «चलता है» से पहले पूछो: क्या मैं इस पर अपना नाम लिखने दूँगा?
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